॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.44.9
धर्मव्यतिक्रमो ह्यस्य समाजस्य ध्रुवं भवेत्।
यत्राधर्मः समुत्तिष्ठेन्न स्थेयं तत्र कर्हिचित्॥ ९
dharmavyatikramo hyasya samājasya dhruvaṃ bhavet|
yatrādharmaḥ samuttiṣṭhenna stheyaṃ tatra karhicit|| 9
अर्थ
जितने लोग यहाँ इकट्ठे हुए हैं, देख रहे हैं, उन्हें अवश्य-अवश्य धर्मोल्लंघनका पाप लगेगा। सखी! अब हमें भी यहाँसे चल देना चाहिये। जहाँ अधर्मकी प्रधानता हो, वहाँ कभी न रहे; यही शास्त्रका नियम है॥ ९॥