श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

स पिता सा च जननी यौ पुष्णीतां स्वपुत्रवत्।

शिशून् बन्धुभिरुत्सृष्टानकल्पैः पोषरक्षणे॥ २२

sa pitā sā ca jananī yau puṣṇītāṃ svaputravat|

śiśūn bandhubhirutsṛṣṭānakalpaiḥ poṣarakṣaṇe|| 22

अर्थ

जिन्हें पालन-पोषण न कर सकनेके कारण स्वजन-सम्बन्धियोंने त्याग दिया है, उन बालकोंको जो लोग अपने पुत्रके समान लाड़-प्यारसे पालते हैं, वे ही वास्तवमें उनके माँ-बाप हैं॥ २२॥✎ 1674

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1674 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नन्द-बाबाने → नन्दबाबाने

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