ज्ञातीन् वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुहृदां सुखम्॥ २३
yāta yūyaṃ vrajaṃ tāta vayaṃ ca snehaduḥkhitān|
jñātīn vo draṣṭumeṣyāmo vidhāya suhṛdāṃ sukham|| 23
अर्थ
पिताजी! अब आपलोग व्रजमें जाइये। इसमें सन्देह नहीं कि हमारे बिना वात्सल्य-स्नेहके कारण आपलोगोंको बहुत दुःख होगा। यहाँके सुहृद्-सम्बन्धियोंको सुखी करके हम आपलोगोंसे मिलनेके लिये आयेंगे’॥ २३॥✎ 1674
यात यूयं व्रजं तात वयं च स्नेहदुःखितान्।
ज्ञातीन् वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुहृदां सुखम्॥ २३
पिताजी! अब आपलोग व्रजमें जाइये। इसमें सन्देह नहीं कि हमारे बिना वात्सल्य-स्नेहके कारण आपलोगोंको बहुत दुःख होगा। यहाँके सुहृद्-सम्बन्धियोंको सुखी करके हम आपलोगोंसे मिलनेके लिये आयेंगे’॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 410) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/23/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)