श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

इत्युक्तस्तौ परिष्वज्य नन्दः प्रणयविह्वलः।

पूरयन्‍नश्रुभिर्नेत्रे सह गोपैर्व्रजं ययौ॥ २५

ityuktastau pariṣvajya nandaḥ praṇayavihvalaḥ|

pūrayannaśrubhirnetre saha gopairvrajaṃ yayau|| 25

अर्थ

भगवान्‌की बात सुनकर नन्दबाबाने प्रेमसे अधीर होकर दोनों भाइयोंको गले लगा लिया और फिर नेत्रोंमें आँसू भरकर गोपोंके साथ व्रजके लिये प्रस्थान किया॥ २५॥✎ 1674

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1674 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नन्द-बाबाने → नन्दबाबाने

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें