श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

यथोपसाद्य तौ दान्तौ गुरौ वृत्तिमनिन्दिताम्।

ग्राहयन्तावुपेतौ स्म भक्त्या देवमिवादृतौ॥ ३२

yathopasādya tau dāntau gurau vṛttimaninditām|

grāhayantāvupetau sma bhaktyā devamivādṛtau|| 32

अर्थ

वे दोनों भाई विधिपूर्वक गुरुजीके पास रहने लगे। उस समय वे बड़े ही सुसंयत, अपनी चेष्टाओंको सर्वथा नियमित रखे हुए थे। गुरुजी तो उनका आदर करते ही थे, भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी भी गुरुकी उत्तम सेवा कैसे करनी चाहिये, इसका आदर्श लोगोंके सामने रखते हुए बड़ी भक्तिसे इष्टदेवके समान उनकी सेवा करने लगे॥ ३२॥

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