श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

तयोर्द्विजवरस्तुष्टः शुद्धभावानुवृत्तिभिः।

प्रोवाच वेदानखिलान् सांगोपनिषदो गुरुः॥ ३३

tayordvijavarastuṣṭaḥ śuddhabhāvānuvṛttibhiḥ|

provāca vedānakhilān sāṃgopaniṣado guruḥ|| 33

अर्थ

गुरुवर सान्दीपनिजी उनकी शुद्धभावसे युक्त सेवासे बहुत प्रसन्‍न हुए। उन्होंने दोनों भाइयोंको छहों अंग और उपनिषदोंके सहित सम्पूर्ण वेदोंकी शिक्षा दी॥ ३३॥

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