श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

समुद्र उवाच

नैवाहार्षमहं देव दैत्यः पंचजनो महान्।

अन्तर्जलचरः कृष्ण शंखरूपधरोऽसुरः॥ ४०

naivāhārṣamahaṃ deva daityaḥ paṃcajano mahān|

antarjalacaraḥ kṛṣṇa śaṃkharūpadharo'suraḥ|| 40

अर्थ

मनुष्यवेषधारी समुद्रने कहा—‘देवाधिदेव श्रीकृष्ण! मैंने उस बालकको नहीं लिया है। मेरे जलमें पंचजन नामका एक बड़ा भारी दैत्य जातिका असुर शंखके रूपमें रहता है। अवश्य ही उसीने वह बालक चुरा लिया होगा’॥ ४०॥

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