मनुष्यवेषधारी समुद्रने कहा—‘देवाधिदेव श्रीकृष्ण! मैंने उस बालकको नहीं लिया है। मेरे जलमें पंचजन नामका एक बड़ा भारी दैत्य जातिका असुर शंखके रूपमें रहता है। अवश्य ही उसीने वह बालक चुरा लिया होगा’॥ ४०॥
नैवाहार्षमहं देव दैत्यः पंचजनो महान्।
अन्तर्जलचरः कृष्ण शंखरूपधरोऽसुरः॥ ४०
मनुष्यवेषधारी समुद्रने कहा—‘देवाधिदेव श्रीकृष्ण! मैंने उस बालकको नहीं लिया है। मेरे जलमें पंचजन नामका एक बड़ा भारी दैत्य जातिका असुर शंखके रूपमें रहता है। अवश्य ही उसीने वह बालक चुरा लिया होगा’॥ ४०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.40 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 413) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/45/40/