मथुराकी प्रजा बहुत दिनोंतक श्रीकृष्ण और बलरामको न देखनेसे अत्यन्त दुःखी हो रही थी। अब उन्हें आया हुआ देख सब-के-सब परमानन्दमें मग्न हो गये, मानो खोया हुआ धन मिल गया हो॥ ५०॥
समनन्दन् प्रजाः सर्वा दृष्ट्वा रामजनार्दनौ।
अपश्यन्त्यो बह्वहानि नष्टलब्धधना इव॥ ५०
मथुराकी प्रजा बहुत दिनोंतक श्रीकृष्ण और बलरामको न देखनेसे अत्यन्त दुःखी हो रही थी। अब उन्हें आया हुआ देख सब-के-सब परमानन्दमें मग्न हो गये, मानो खोया हुआ धन मिल गया हो॥ ५०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.50 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 414) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/45/50/