श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

उद्धवजीकी व्रजयात्रा

श्रीशुक उवाच

वृष्णीनां प्रवरो मन्त्री कृष्णस्य दयितः सखा।

शिष्यो बृहस्पतेः साक्षादुद्धवो बुद्धिसत्तमः॥ १

vṛṣṇīnāṃ pravaro mantrī kṛṣṇasya dayitaḥ sakhā|

śiṣyo bṛhaspateḥ sākṣāduddhavo buddhisattamaḥ|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! उद्धवजी वृष्णिवंशियोंमें एक प्रधान पुरुष थे। वे साक्षात् बृहस्पतिजीके शिष्य और परम बुद्धिमान् थे। उनकी महिमाके सम्बन्धमें इससे बढ़कर और कौन-सी बात कही जा सकती है कि वे भगवान् श्रीकृष्णके प्यारे सखा तथा मन्त्री भी थे॥ १॥

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