शृण्वन्त्यश्रूण्यवास्राक्षीत् स्नेहस्नुतपयोधरा॥ २८
yaśodā varṇyamānāni putrasya caritāni ca|
śṛṇvantyaśrūṇyavāsrākṣīt snehasnutapayodharā|| 28
अर्थ
यशोदारानी भी वहीं बैठकर नन्दबाबाकी बातें सुन रही थीं, श्रीकृष्णकी एक-एक लीला सुनकर उनके नेत्रोंसे आँसू बहते जाते थे और पुत्रस्नेहकी बाढ़से उनके स्तनोंसे दूधकी धारा बहती जा रही थी॥ २८॥
यशोदा वर्ण्यमानानि पुत्रस्य चरितानि च।
शृण्वन्त्यश्रूण्यवास्राक्षीत् स्नेहस्नुतपयोधरा॥ २८
यशोदारानी भी वहीं बैठकर नन्दबाबाकी बातें सुन रही थीं, श्रीकृष्णकी एक-एक लीला सुनकर उनके नेत्रोंसे आँसू बहते जाते थे और पुत्रस्नेहकी बाढ़से उनके स्तनोंसे दूधकी धारा बहती जा रही थी॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.46.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 418) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/46/28/