॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.46.33
तस्मिन् भवन्तावखिलात्महेतौ
नारायणे कारणमर्त्यमूर्तौ।
भावं विधत्तां नितरां महात्मन्
किं वावशिष्टं युवयोः सुकृत्यम्॥ ३३
tasmin bhavantāvakhilātmahetau
nārāyaṇe kāraṇamartyamūrtau|
bhāvaṃ vidhattāṃ nitarāṃ mahātman
kiṃ vāvaśiṣṭaṃ yuvayoḥ sukṛtyam|| 33
अर्थ
वे भगवान् ही, जो सबके आत्मा और परम कारण हैं, भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करने और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये मनुष्यका-सा शरीर ग्रहण करके प्रकट हुए हैं। उनके प्रति आप दोनोंका ऐसा सुदृढ़ वात्सल्यभाव है; फिर महात्माओ! आप दोनोंके लिये अब कौन-सा शुभ कर्म करना शेष रह जाता है॥ ३३॥