॥ श्रीहरिः ॥
मय्यावेश्य मनः कृत्स्नं१ विमुक्ताशेषवृत्ति यत्।✎ 2226
अनुस्मरन्त्यो मां नित्यमचिरान्मामुपैष्यथ॥ ३६
mayyāveśya manaḥ kṛtsnaṃ vimuktāśeṣavṛtti yat|
anusmarantyo māṃ nityamacirānmāmupaiṣyatha|| 36
अर्थ
अशेष वृत्तियोंसे रहित सम्पूर्ण मन मुझमें लगाकर जब तुमलोग मेरा अनुस्मरण करोगी, तब शीघ्र ही सदाके लिये मुझे प्राप्त हो जाओगी॥ ३६॥✎ 1677
मय्यावेश्य मनः कृत्स्नं विमुक्ताशेषवृत्ति यत्।
अनुस्मरन्त्यो मां नित्यमचिरान्मामुपैष्यथ॥ ३६
अशेष वृत्तियोंसे रहित सम्पूर्ण मन मुझमें लगाकर जब तुमलोग मेरा अनुस्मरण करोगी, तब शीघ्र ही सदाके लिये मुझे प्राप्त हो जाओगी॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.47.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 428) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/36/टिप्पणियाँ
- १
कृष्णे।
(मुद्रित पृष्ठ 428)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #1677 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रास-क्रीडा → रासक्रीडा
- #2226 टिप्पणी: → कृष्णे।