श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.36

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

मय्यावेश्य मनः कृत्स्नं१ विमुक्ताशेषवृत्ति यत्।✎ 2226

अनुस्मरन्त्यो मां नित्यमचिरान्मामुपैष्यथ॥ ३६

mayyāveśya manaḥ kṛtsnaṃ vimuktāśeṣavṛtti yat|

anusmarantyo māṃ nityamacirānmāmupaiṣyatha|| 36

अर्थ

अशेष वृत्तियोंसे रहित सम्पूर्ण मन मुझमें लगाकर जब तुमलोग मेरा अनुस्मरण करोगी, तब शीघ्र ही सदाके लिये मुझे प्राप्त हो जाओगी॥ ३६॥✎ 1677

टिप्पणियाँ

  1. १

    कृष्णे।

    (मुद्रित पृष्ठ 428)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1677 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: रास-क्रीडा → रासक्रीडा
  • #2226 टिप्पणी: → कृष्णे।

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