श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

ताः किं निशाः स्मरति यासु तदा प्रियाभि-

र्वृन्दावने कुमुदकुन्दशशांकरम्ये।

रेमे क्वणच्चरणनूपुररासगोष्ठ्या-

मस्माभिरीडितमनोज्ञकथः कदाचित्॥ ४३

tāḥ kiṃ niśāḥ smarati yāsu tadā priyābhi-

rvṛndāvane kumudakundaśaśāṃkaramye|

reme kvaṇaccaraṇanūpurarāsagoṣṭhyā-

masmābhirīḍitamanojñakathaḥ kadācit|| 43

अर्थ

कुछ गोपियोंने कहा—‘उद्धवजी! क्या कभी श्रीकृष्ण उन रात्रियोंका स्मरण करते हैं, जब कुमुदिनी तथा कुन्दके पुष्प खिले हुए थे, चारों ओर चाँदनी छिटक रही थी और वृन्दावन अत्यन्त रमणीय हो रहा था! उन रात्रियोंमें ही उन्होंने रास-मण्डल बनाकर हमलोगोंके साथ नृत्य किया था। कितनी सुन्दर थी वह रासलीला! उस समय हमलोगोंके पैरोंके नूपुर रुनझुन-रुनझुन बज रहे थे। हम सब सखियाँ उन्हींकी सुन्दर-सुन्दर लीलाओंका गान कर रही थीं और वे हमारे साथ नाना प्रकारके विहार कर रहे थे’॥ ४३॥✎ 1923

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1923 मुद्रणकी अपनी भूल (गीताप्रेसके पुराने संस्करणों और ग्रन्थकी अपनी गणनासे): हम-लोगोंके → हमलोगोंके

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