saṃjīvayan nu no gātrairyathendro vanamambudaiḥ|| 44
अर्थ
कुछ दूसरी गोपियाँ बोल उठीं—‘उद्धवजी! हम सब तो उन्हींके विरहकी आगसे जल रही हैं। देवराज इन्द्र जैसे जल बरसाकर वनको हरा-भरा कर देते हैं, उसी प्रकार क्या कभी श्रीकृष्ण भी अपने कर-स्पर्श आदिसे हमें जीवनदान देनेके लिये यहाँ आवेंगे?’॥ ४४॥
अप्येष्यतीह दाशार्हस्तप्ताः स्वकृतया शुचा।
संजीवयन् नु नो गात्रैर्यथेन्द्रो वनमम्बुदैः॥ ४४
कुछ दूसरी गोपियाँ बोल उठीं—‘उद्धवजी! हम सब तो उन्हींके विरहकी आगसे जल रही हैं। देवराज इन्द्र जैसे जल बरसाकर वनको हरा-भरा कर देते हैं, उसी प्रकार क्या कभी श्रीकृष्ण भी अपने कर-स्पर्श आदिसे हमें जीवनदान देनेके लिये यहाँ आवेंगे?’॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.47.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 430) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/47/44/