श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

अप्येष्यतीह दाशार्हस्तप्ताः स्वकृतया शुचा।

संजीवयन् नु नो गात्रैर्यथेन्द्रो वनमम्बुदैः॥ ४४

apyeṣyatīha dāśārhastaptāḥ svakṛtayā śucā|

saṃjīvayan nu no gātrairyathendro vanamambudaiḥ|| 44

अर्थ

कुछ दूसरी गोपियाँ बोल उठीं—‘उद्धवजी! हम सब तो उन्हींके विरहकी आगसे जल रही हैं। देवराज इन्द्र जैसे जल बरसाकर वनको हरा-भरा कर देते हैं, उसी प्रकार क्या कभी श्रीकृष्ण भी अपने कर-स्पर्श आदिसे हमें जीवनदान देनेके लिये यहाँ आवेंगे?’॥ ४४॥

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