paraṃ saukhyaṃ hi nairāśyaṃ svairiṇyapyāha piṃgalā|
tajjānatīnāṃ naḥ kṛṣṇe tathāpyāśā duratyayā|| 47
अर्थ
देखो वेश्या होनेपर भी पिंगलाने क्या ही ठीक कहा है—संसारमें किसीकी आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है।’ यह बात हम जानती हैं, फिर भी हम भगवान् श्रीकृष्णके लौटनेकी आशा छोड़नेमें असमर्थ हैं। उनके शुभागमनकी आशा ही तो हमारा जीवन है॥ ४७॥
परं सौख्यं हि नैराश्यं स्वैरिण्यप्याह पिंगला।
तज्जानतीनां नः कृष्णे तथाप्याशा दुरत्यया॥ ४७
देखो वेश्या होनेपर भी पिंगलाने क्या ही ठीक कहा है—संसारमें किसीकी आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है।’ यह बात हम जानती हैं, फिर भी हम भगवान् श्रीकृष्णके लौटनेकी आशा छोड़नेमें असमर्थ हैं। उनके शुभागमनकी आशा ही तो हमारा जीवन है॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.47.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 430) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/47/47/