श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.47

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

परं सौख्यं हि नैराश्यं स्वैरिण्यप्याह पिंगला।

तज्जानतीनां नः कृष्णे तथाप्याशा दुरत्यया॥ ४७

paraṃ saukhyaṃ hi nairāśyaṃ svairiṇyapyāha piṃgalā|

tajjānatīnāṃ naḥ kṛṣṇe tathāpyāśā duratyayā|| 47

अर्थ

देखो वेश्या होनेपर भी पिंगलाने क्या ही ठीक कहा है—संसारमें किसीकी आशा न रखना ही सबसे बड़ा सुख है।’ यह बात हम जानती हैं, फिर भी हम भगवान् श्रीकृष्णके लौटनेकी आशा छोड़नेमें असमर्थ हैं। उनके शुभागमनकी आशा ही तो हमारा जीवन है॥ ४७॥

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