श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.48

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

क उत्सहेत सन्त्यक्तुमुत्तमश्‍लोकसंविदम्।

अनिच्छतोऽपि यस्य श्रीरंगान्‍न च्यवते क्‍वचित्॥ ४८

ka utsaheta santyaktumuttamaślokasaṃvidam|

anicchato'pi yasya śrīraṃgānna cyavate kvacit|| 48

अर्थ

हमारे प्यारे श्यामसुन्दरने, जिनकी कीर्तिका गान बड़े-बड़े महात्मा करते रहते हैं, हमसे एकान्तमें जो मीठी-मीठी प्रेमकी बातें की हैं उन्हें छोड़नेका, भुलानेका उत्साह भी हम कैसे कर सकती हैं? देखो तो, उनकी इच्छा न होनेपर भी स्वयं लक्ष्मीजी उनके चरणोंसे लिपटी रहती हैं, एक क्षणके लिये भी उनका अंग-संग छोड़कर कहीं नहीं जातीं॥ ४८॥

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