श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तदनन्तर सबके आत्मा तथा सब कुछ देखनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपनेसे मिलनकी आकांक्षा रखकर व्याकुल हुई कुब्जाका प्रिय करने—उसे सुख देनेकी इच्छासे उसके घर गये॥ १॥✎ 1679
अथ विज्ञाय भगवान् सर्वात्मा सर्वदर्शनः।
सैरन्ध्र्याः कामतप्तायाः प्रियमिच्छन् गृहं ययौ॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तदनन्तर सबके आत्मा तथा सब कुछ देखनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपनेसे मिलनकी आकांक्षा रखकर व्याकुल हुई कुब्जाका प्रिय करने—उसे सुख देनेकी इच्छासे उसके घर गये॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 435) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)