श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

भगवान्‌का कुब्जा और अक्रूरजीके घर जाना

श्रीशुक उवाच

अथ विज्ञाय भगवान् सर्वात्मा सर्वदर्शनः।

सैरन्ध्र्याः कामतप्तायाः प्रियमिच्छन् गृहं ययौ॥ १✎ 2105

atha vijñāya bhagavān sarvātmā sarvadarśanaḥ|

sairandhryāḥ kāmataptāyāḥ priyamicchan gṛhaṃ yayau|| 1

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तदनन्तर सबके आत्मा तथा सब कुछ देखनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण अपनेसे मिलनकी आकांक्षा रखकर व्याकुल हुई कुब्जाका प्रिय करने—उसे सुख देनेकी इच्छासे उसके घर गये॥ १॥✎ 1679

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1679 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: श्याम-सुन्दर → श्यामसुन्दर
  • #2105 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): रन्ध्रॺा: का → रन्ध्र्याः का

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