श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

महार्होपस्करैराढ्यं कामोपायोपबृंहितम्।

मुक्तादामपताकाभिर्वितानशयनासनैः ।

धूपैः सुरभिभिर्दीपैः स्रग्गन्धैरपि मण्डितम्॥ २

mahārhopaskarairāḍhyaṃ kāmopāyopabṛṃhitam|

muktādāmapatākābhirvitānaśayanāsanaiḥ |

dhūpaiḥ surabhibhirdīpaiḥ sraggandhairapi maṇḍitam|| 2

अर्थ

कुब्जाका घर बहुमूल्य सामग्रियोंसे सम्पन्‍न था। उसमें शृंगार-रसका उद्दीपन करनेवाली बहुत-सी साधन-सामग्री भी भरी हुई थी। मोतीकी झालरें और स्थान-स्थानपर झंडियाँ भी लगी हुई थीं। चँदोवे तने हुए थे। सेजें बिछायी हुई थीं और बैठनेके लिये बहुत सुन्दर-सुन्दर आसन लगाये हुए थे। धूपकी सुगन्ध फैल रही थी। दीपककी शिखाएँ जगमगा रही थीं। स्थान-स्थानपर फूलोंके हार और चन्दन रखे हुए थे॥ २॥✎ 1679

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1679 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: श्याम-सुन्दर → श्यामसुन्दर

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