श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

गृहं तमायान्तमवेक्ष्य साऽऽसनात्

सद्यः समुत्थाय हि जातसम्भ्रमा।

यथोपसंगम्य सखीभिरच्युतं

सभाजयामास सदासनादिभिः॥ ३

gṛhaṃ tamāyāntamavekṣya sā''sanāt

sadyaḥ samutthāya hi jātasambhramā|

yathopasaṃgamya sakhībhiracyutaṃ

sabhājayāmāsa sadāsanādibhiḥ|| 3

अर्थ

भगवान्‌को अपने घर आते देख कुब्जा तुरंत हड़बड़ाकर अपने आसनसे उठ खड़ी हुई और सखियोंके साथ आगे बढ़कर उसने विधिपूर्वक भगवान्‌का स्वागत-सत्कार किया। फिर श्रेष्ठ आसन आदि देकर विविध उपचारोंसे उनकी विधिपूर्वक पूजा की॥ ३॥✎ 1679

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1679 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: श्याम-सुन्दर → श्यामसुन्दर

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