भगवान्को अपने घर आते देख कुब्जा तुरंत हड़बड़ाकर अपने आसनसे उठ खड़ी हुई और सखियोंके साथ आगे बढ़कर उसने विधिपूर्वक भगवान्का स्वागत-सत्कार किया। फिर श्रेष्ठ आसन आदि देकर विविध उपचारोंसे उनकी विधिपूर्वक पूजा की॥ ३॥✎ 1679
गृहं तमायान्तमवेक्ष्य साऽऽसनात्
सद्यः समुत्थाय हि जातसम्भ्रमा।
यथोपसंगम्य सखीभिरच्युतं
सभाजयामास सदासनादिभिः॥ ३
भगवान्को अपने घर आते देख कुब्जा तुरंत हड़बड़ाकर अपने आसनसे उठ खड़ी हुई और सखियोंके साथ आगे बढ़कर उसने विधिपूर्वक भगवान्का स्वागत-सत्कार किया। फिर श्रेष्ठ आसन आदि देकर विविध उपचारोंसे उनकी विधिपूर्वक पूजा की॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 435) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)