श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

आत्मसृष्टमिदं विश्‍वमन्वाविश्य स्वशक्तिभिः।

ईयते बहुधा ब्रह्मन् श्रुतप्रत्यक्षगोचरम्॥ १९

ātmasṛṣṭamidaṃ viśvamanvāviśya svaśaktibhiḥ|

īyate bahudhā brahman śrutapratyakṣagocaram|| 19

अर्थ

परमात्मन्! आपने ही अपनी शक्तिसे इसकी रचना की है और आप ही अपनी काल, माया आदि शक्तियोंसे इसमें प्रविष्ट होकर जितनी भी वस्तुएँ देखी और सुनी जाती हैं, उनके रूपमें प्रतीत हो रहे हैं॥ १९॥✎ 1680

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1680 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भर-कर → भरकर

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