श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीयाद्

भक्तप्रियादृतगिरः सुहृदः कृतज्ञात्।

सर्वान् ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामा-

नात्मानमप्युपचयापचयौ न यस्य॥ २६

kaḥ paṇḍitastvadaparaṃ śaraṇaṃ samīyād

bhaktapriyādṛtagiraḥ suhṛdaḥ kṛtajñāt|

sarvān dadāti suhṛdo bhajato'bhikāmā-

nātmānamapyupacayāpacayau na yasya|| 26

अर्थ

प्रभो! आप प्रेमी भक्तोंके परम प्रियतम, सत्यवक्ता, अकारण हितू और कृतज्ञ हैं—जरा-सी सेवाको भी मान लेते हैं। भला, ऐसा कौन बुद्धिमान् पुरुष है जो आपको छोड़कर किसी दूसरेकी शरणमें जायगा? आप अपना भजन करनेवाले प्रेमी भक्तकी समस्त अभिलाषाएँ पूर्ण कर देते हैं। यहाँतक कि जिसकी कभी क्षति और वृद्धि नहीं होती—जो एकरस है, अपने उस आत्माका भी आप दान कर देते हैं॥ २६॥

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