श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

दिष्ट्या जनार्दन भवानिह नः प्रतीतो

योगेश्‍वरैरपि दुरापगतिः सुरेशैः।

छिन्ध्याशु नः सुतकलत्रधनाप्तगेह-

देहादिमोहरशनां भवदीयमायाम्॥ २७

diṣṭyā janārdana bhavāniha naḥ pratīto

yogeśvarairapi durāpagatiḥ sureśaiḥ|

chindhyāśu naḥ sutakalatradhanāptageha-

dehādimoharaśanāṃ bhavadīyamāyām|| 27

अर्थ

भक्तोंके कष्ट मिटानेवाले और जन्म-मृत्युके बन्धनसे छुड़ानेवाले प्रभो! बड़े-बड़े योगिराज और देवराज भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते। परन्तु हमें आपका साक्षात् दर्शन हो गया, यह कितने सौभाग्यकी बात है। प्रभो! हम स्त्री, पुत्र, धन, स्वजन, गेह और देह आदिके मोहकी रस्सीसे बँधे हुए हैं। अवश्य ही यह आपकी मायाका खेल है। आप कृपा करके इस गाढ़े बन्धनको शीघ्र काट दीजिये’॥ २७॥

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