श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

स भवान् सुहृदां वै नः श्रेयाञ्छ्रेयश्‍चिकीर्षया।

जिज्ञासार्थं पाण्डवानां गच्छस्व त्वं गजाह्वयम्॥ ३२

sa bhavān suhṛdāṃ vai naḥ śreyāñchreyaścikīrṣayā|

jijñāsārthaṃ pāṇḍavānāṃ gacchasva tvaṃ gajāhvayam|| 32

अर्थ

चाचाजी! आप हमारे हितैषी सुहृदोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिये आप पाण्डवोंका हित करनेके लिये तथा उनका कुशल-मंगल जाननेके लिये हस्तिनापुर जाइये॥ ३२॥

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