॥ श्रीहरिः ॥
स भवान् सुहृदां वै नः श्रेयाञ्छ्रेयश्चिकीर्षया।
जिज्ञासार्थं पाण्डवानां गच्छस्व त्वं गजाह्वयम्॥ ३२
sa bhavān suhṛdāṃ vai naḥ śreyāñchreyaścikīrṣayā|
jijñāsārthaṃ pāṇḍavānāṃ gacchasva tvaṃ gajāhvayam|| 32
अर्थ
चाचाजी! आप हमारे हितैषी सुहृदोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिये आप पाण्डवोंका हित करनेके लिये तथा उनका कुशल-मंगल जाननेके लिये हस्तिनापुर जाइये॥ ३२॥
स भवान् सुहृदां वै नः श्रेयाञ्छ्रेयश्चिकीर्षया।
जिज्ञासार्थं पाण्डवानां गच्छस्व त्वं गजाह्वयम्॥ ३२
चाचाजी! आप हमारे हितैषी सुहृदोंमें सर्वश्रेष्ठ हैं। इसलिये आप पाण्डवोंका हित करनेके लिये तथा उनका कुशल-मंगल जाननेके लिये हस्तिनापुर जाइये॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 439) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/32/