श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

सा मज्जनालेपदुकूलभूषण-

स्रग्गन्धताम्बूलसुधासवादिभिः ।

प्रसाधितात्मोपससार माधवं

सव्रीडलीलोत्स्मितविभ्रमेक्षितैः ॥ ५

sā majjanālepadukūlabhūṣaṇa-

sraggandhatāmbūlasudhāsavādibhiḥ |

prasādhitātmopasasāra mādhavaṃ

savrīḍalīlotsmitavibhramekṣitaiḥ || 5

अर्थ

तब कुब्जा स्नान, अंगराग, वस्त्र, आभूषण, हार, गन्ध (इत्र आदि), ताम्बूल और सुधासव आदिसे अपनेको खूब सजाकर लीलामयी लजीली मुसकान तथा हाव-भावके साथ भगवान्‌की ओर देखती हुई उनके पास आयी॥ ५॥✎ 1679

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1679 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: श्याम-सुन्दर → श्यामसुन्दर

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