कुब्जा नवीन मिलनके संकोचसे कुछ झिझक रही थी। तब श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने उसे अपने पास बुला लिया और उसकी कंकणसे सुशोभित कलाई पकड़कर अपने पास बैठा लिया और उसके साथ क्रीडा करने लगे। परीक्षित्! कुब्जाने इस जन्ममें केवल भगवान्को अंगराग अर्पित किया था, उसी एक शुभकर्मके फलस्वरूप उसे ऐसा अनुपम अवसर मिला॥ ६॥✎ 1679
आहूय कान्तां नवसंगमह्रिया
विशंकितां कंकणभूषिते करे।
प्रगृह्य शय्यामधिवेश्य रामया
रेमेऽनुलेपार्पणपुण्यलेशया ॥ ६
कुब्जा नवीन मिलनके संकोचसे कुछ झिझक रही थी। तब श्यामसुन्दर श्रीकृष्णने उसे अपने पास बुला लिया और उसकी कंकणसे सुशोभित कलाई पकड़कर अपने पास बैठा लिया और उसके साथ क्रीडा करने लगे। परीक्षित्! कुब्जाने इस जन्ममें केवल भगवान्को अंगराग अर्पित किया था, उसी एक शुभकर्मके फलस्वरूप उसे ऐसा अनुपम अवसर मिला॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 435) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/48/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)