श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

सानंगतप्तकुचयोरुरसस्तथाक्ष्णो-

र्जिघ्रन्त्यनन्तचरणेन रुजो मृजन्ती।

दोर्भ्यां स्तनान्तरगतं परिरभ्य कान्त-

मानन्दमूर्तिमजहादतिदीर्घतापम्॥ ७

sānaṃgataptakucayorurasastathākṣṇo-

rjighrantyanantacaraṇena rujo mṛjantī|

dorbhyāṃ stanāntaragataṃ parirabhya kānta-

mānandamūrtimajahādatidīrghatāpam|| 7

अर्थ

कुब्जा भगवान् श्रीकृष्णके चरणोंको अपने काम-संतप्त हृदय, वक्षःस्थल और नेत्रोंपर रखकर उनकी दिव्य सुगन्ध लेने लगी और इस प्रकार उसने अपने हृदयकी सारी आधि-व्याधि शान्त कर ली। वक्षःस्थलसे सटे हुए आनन्दमूर्ति प्रियतम श्यामसुन्दरका अपनी दोनों भुजाओंसे गाढ़ आलिंगन करके कुब्जाने दीर्घकालसे बढ़े हुए विरहतापको शान्त किया॥ ७॥✎ 1679

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1679 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: श्याम-सुन्दर → श्यामसुन्दर

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