॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.49.15
समदुःखसुखोऽक्रूरो विदुरश्च महायशाः।
सान्त्वयामासतुः कुन्तीं तत्पुत्रोत्पत्तिहेतुभिः॥ १५
samaduḥkhasukho'krūro viduraśca mahāyaśāḥ|
sāntvayāmāsatuḥ kuntīṃ tatputrotpattihetubhiḥ|| 15
अर्थ
अक्रूरजी और विदुरजी दोनों ही सुख और दुःखको समान दृष्टिसे देखते थे। दोनों यशस्वी महात्माओंने कुन्तीको उसके पुत्रोंके जन्मदाता धर्म, वायु आदि देवताओंकी याद दिलायी और यह कहकर कि, तुम्हारे पुत्र अधर्मका नाश करनेके लिये ही पैदा हुए हैं, बहुत कुछ समझाया-बुझाया और सान्त्वना दी॥ १५॥✎ 1681