श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तुम्हारी परदादी कुन्ती इस प्रकार अपने सगे-सम्बन्धियों और अन्तमें जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णको स्मरण करके अत्यन्त दुःखित हो गयीं और फफक-फफककर रोने लगीं॥ १४॥
इत्यनुस्मृत्य स्वजनं कृष्णं च जगदीश्वरम्।
प्रारुदद् दुःखिता राजन् भवतां प्रपितामही॥ १४
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! तुम्हारी परदादी कुन्ती इस प्रकार अपने सगे-सम्बन्धियों और अन्तमें जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्णको स्मरण करके अत्यन्त दुःखित हो गयीं और फफक-फफककर रोने लगीं॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.49.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 442) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/49/14/