॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.49.22
अधर्मोपचितं वित्तं हरन्त्यन्येऽल्पमेधसः।
सम्भोजनीयापदेशैर्जलानीव जलौकसः॥ २२
adharmopacitaṃ vittaṃ harantyanye'lpamedhasaḥ|
sambhojanīyāpadeśairjalānīva jalaukasaḥ|| 22
अर्थ
जिन स्त्री-पुत्रोंको हम अपना समझते हैं, वे तो ‘हम तुम्हारे अपने हैं, हमारा भरण-पोषण करना तुम्हारा धर्म है’—इस प्रकारकी बातें बनाकर मूर्ख प्राणीके अधर्मसे इकट्ठे किये हुए धनको लूट लेते हैं, जैसे जलमें रहनेवाले जन्तुओंके सर्वस्व जलको उन्हींके सम्बन्धी चाट जाते हैं॥ २२॥