यह मूर्ख जीव जिन्हें अपना समझकर अधर्म करके भी पालता-पोसता है, वे ही प्राण, धन और पुत्र आदि इस जीवको असन्तुष्ट छोड़कर ही चले जाते हैं॥ २३॥
पुष्णाति यानधर्मेण स्वबुद्ध्या तमपण्डितम्।
तेऽकृतार्थं प्रहिण्वन्ति प्राणा रायः सुतादयः॥ २३
यह मूर्ख जीव जिन्हें अपना समझकर अधर्म करके भी पालता-पोसता है, वे ही प्राण, धन और पुत्र आदि इस जीवको असन्तुष्ट छोड़कर ही चले जाते हैं॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.49.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 443) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/49/23/