जब अक्रूरजी कुन्तीके घर आये, तब वह अपने भाईके पास जा बैठीं। अक्रूरजीको देखकर कुन्तीके मनमें अपने मायकेकी स्मृति जग गयी और नेत्रोंमें आँसू भर आये। उन्होंने कहा—॥ ७॥✎ 2106
पृथा तु भ्रातरं प्राप्तमक्रूरमुपसृत्य तम्।
उवाच जन्मनिलयं स्मरन्त्यश्रुकलेक्षणा॥ ७
जब अक्रूरजी कुन्तीके घर आये, तब वह अपने भाईके पास जा बैठीं। अक्रूरजीको देखकर कुन्तीके मनमें अपने मायकेकी स्मृति जग गयी और नेत्रोंमें आँसू भर आये। उन्होंने कहा—॥ ७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.49.7 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 441) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/49/7/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)