श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे। पुत्रका जन्म होनेपर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्दसे भर गया। उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। फिर वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलवाकर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्रका जातकर्म-संस्कार करवाया। साथ ही देवता और पितरोंकी विधिपूर्वक पूजा भी करवायी॥ १-२॥✎ 140014011402205922352236
यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
वाचयित्वा स्वस्त्ययनं जातकर्मात्मजस्य वै।
कारयामास विधिवत् पितृदेवार्चनं तथा॥ २
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! नन्दबाबा बड़े मनस्वी और उदार थे। पुत्रका जन्म होनेपर तो उनका हृदय विलक्षण आनन्दसे भर गया। उन्होंने स्नान किया और पवित्र होकर सुन्दर-सुन्दर वस्त्राभूषण धारण किये। फिर वेदज्ञ ब्राह्मणोंको बुलवाकर स्वस्तिवाचन और अपने पुत्रका जातकर्म-संस्कार करवाया। साथ ही देवता और पितरोंकी विधिपूर्वक पूजा भी करवायी॥ १-२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.5.2 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 151) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/5/2/
टिप्पणियाँ
१
धिना पितृ०।
(मुद्रित पृष्ठ 151)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
#1400 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): वंदीजनण् → वंदीजन
#1401 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): मागधञ् → मागध