उसने अपनी गदा बड़े जोरसे आकाशमें घुमायी और इसके बाद प्रद्युम्नजीपर चला दी। गदा चलाते समय उसने इतना कर्कश सिंहनाद किया, मानो बिजली कड़क रही हो॥ १९॥
गदामाविध्य तरसा प्रद्युम्नाय महात्मने।
प्रक्षिप्य व्यनदन्नादं वज्रनिष्पेषनिष्ठुरम्॥ १९
उसने अपनी गदा बड़े जोरसे आकाशमें घुमायी और इसके बाद प्रद्युम्नजीपर चला दी। गदा चलाते समय उसने इतना कर्कश सिंहनाद किया, मानो बिजली कड़क रही हो॥ १९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.55.19 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 483) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/55/19/