श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.55.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 55 · अथ पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

तामापतन्तीं भगवान् प्रद्युम्‍नो गदया गदाम्।

अपास्य शत्रवे क्रुद्धः प्राहिणोत् स्वगदां नृप॥ २०

tāmāpatantīṃ bhagavān pradyumno gadayā gadām|

apāsya śatrave kruddhaḥ prāhiṇot svagadāṃ nṛpa|| 20

अर्थ

परीक्षित्! भगवान् प्रद्युम्‍नने देखा कि उसकी गदा बड़े वेगसे मेरी ओर आ रही है। तब उन्होंने अपनी गदाके प्रहारसे उसकी गदा गिरा दी और क्रोधमें भरकर अपनी गदा उसपर चलायी॥ २०॥✎ 2113

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2113 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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