भगवान् श्रीकृष्णने अपनी गदाकी चोटसे पहाड़ोंको तोड़-फोड़ डाला और शस्त्रोंकी मोरचे-बंदीको बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर दिया। चक्रके द्वारा अग्नि, जल और वायुकी चहारदीवारियोंको तहस-नहस कर दिया और मुर दैत्यके फंदोंको तलवारसे काट-कूटकर अलग रख दिया॥ ४॥
गदया निर्बिभेदाद्रीन् शस्त्रदुर्गाणि सायकैः।
चक्रेणाग्निं जलं वायुं मुरपाशांस्तथासिना॥ ४
भगवान् श्रीकृष्णने अपनी गदाकी चोटसे पहाड़ोंको तोड़-फोड़ डाला और शस्त्रोंकी मोरचे-बंदीको बाणोंसे छिन्न-भिन्न कर दिया। चक्रके द्वारा अग्नि, जल और वायुकी चहारदीवारियोंको तहस-नहस कर दिया और मुर दैत्यके फंदोंको तलवारसे काट-कूटकर अलग रख दिया॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.59.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 504) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/59/4/