श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

कलेवरं परशुभिश्छित्त्वा तत्ते व्रजौकसः।

दूरे क्षिप्त्वावयवशो न्यदहन् काष्ठधिष्ठितम्॥ ३३

kalevaraṃ paraśubhiśchittvā tatte vrajaukasaḥ|

dūre kṣiptvāvayavaśo nyadahan kāṣṭhadhiṣṭhitam|| 33

अर्थ

तबतक व्रजवासियोंने कुल्हाड़ीसे पूतनाके शरीरको टुकड़े-टुकड़े कर डाला और गोकुलसे दूर ले जाकर लकड़ियोंपर रखकर जला दिया॥ ३३॥✎ 2060

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2060 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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