श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.6.32

दशम स्कन्ध · अध्याय 6 · अथ षष्ठोऽध्यायः

नूनं बतर्षिः संजातो योगेशो वा समास सः।

स एव दृष्टो ह्युत्पातो यदाहानकदुन्दुभिः॥ ३२

nūnaṃ batarṣiḥ saṃjāto yogeśo vā samāsa saḥ|

sa eva dṛṣṭo hyutpāto yadāhānakadundubhiḥ|| 32

अर्थ

वे कहने लगे—‘यह तो बड़े आश्‍चर्यकी बात है, अवश्य ही वसुदेवके रूपमें किसी ऋषिने जन्म ग्रहण किया है। अथवा सम्भव है वसुदेवजी पूर्वजन्ममें कोई योगेश्‍वर रहे हों; क्योंकि उन्होंने जैसा कहा था, वैसा ही उत्पात यहाँ देखनेमें आ रहा है॥ ३२॥✎ 2060

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2060 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें