॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.6.32
नूनं बतर्षिः संजातो योगेशो वा समास सः।
स एव दृष्टो ह्युत्पातो यदाहानकदुन्दुभिः॥ ३२
nūnaṃ batarṣiḥ saṃjāto yogeśo vā samāsa saḥ|
sa eva dṛṣṭo hyutpāto yadāhānakadundubhiḥ|| 32
अर्थ
वे कहने लगे—‘यह तो बड़े आश्चर्यकी बात है, अवश्य ही वसुदेवके रूपमें किसी ऋषिने जन्म ग्रहण किया है। अथवा सम्भव है वसुदेवजी पूर्वजन्ममें कोई योगेश्वर रहे हों; क्योंकि उन्होंने जैसा कहा था, वैसा ही उत्पात यहाँ देखनेमें आ रहा है॥ ३२॥✎ 2060