नन्दबाबाके साथ आनेवाले व्रजवासियोंकी नाकमें जब चिताके धूएँकी सुगन्ध पहुँची, तब ‘यह क्या है? कहाँसे ऐसी सुगन्ध आ रही है?’ इस प्रकार कहते हुए वे व्रजमें पहुँचे॥ ४१॥
कटधूमस्य सौरभ्यमवघ्राय व्रजौकसः।
किमिदं कुत एवेति वदन्तो व्रजमाययुः॥ ४१
नन्दबाबाके साथ आनेवाले व्रजवासियोंकी नाकमें जब चिताके धूएँकी सुगन्ध पहुँची, तब ‘यह क्या है? कहाँसे ऐसी सुगन्ध आ रही है?’ इस प्रकार कहते हुए वे व्रजमें पहुँचे॥ ४१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.6.41 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 161) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/6/41/