श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.62.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 62 · अथ द्विषष्टितमोऽध्यायः

कं त्वं मृगयसे सुभ्रूः कीदृशस्ते मनोरथः।

हस्तग्राहं न तेऽद्यापि राजपुत्र्युपलक्षये॥ १५✎ 2122

kaṃ tvaṃ mṛgayase subhrūḥ kīdṛśaste manorathaḥ|

hastagrāhaṃ na te'dyāpi rājaputryupalakṣaye|| 15

अर्थ

‘सुन्दरी! राजकुमारी! मैं देखती हूँ कि अभीतक किसीने तुम्हारा पाणिग्रहण भी नहीं किया है। फिर तुम किसे ढूँढ़ रही हो और तुम्हारे मनोरथका क्या स्वरूप है?’॥ १५॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2122 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): जपुत्रॺुपलक्ष → जपुत्र्युपलक्ष

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