हस्तग्राहं न तेऽद्यापि राजपुत्र्युपलक्षये॥ १५✎ 2122
kaṃ tvaṃ mṛgayase subhrūḥ kīdṛśaste manorathaḥ|
hastagrāhaṃ na te'dyāpi rājaputryupalakṣaye|| 15
अर्थ
‘सुन्दरी! राजकुमारी! मैं देखती हूँ कि अभीतक किसीने तुम्हारा पाणिग्रहण भी नहीं किया है। फिर तुम किसे ढूँढ़ रही हो और तुम्हारे मनोरथका क्या स्वरूप है?’॥ १५॥
कं त्वं मृगयसे सुभ्रूः कीदृशस्ते मनोरथः।
हस्तग्राहं न तेऽद्यापि राजपुत्र्युपलक्षये॥ १५
‘सुन्दरी! राजकुमारी! मैं देखती हूँ कि अभीतक किसीने तुम्हारा पाणिग्रहण भी नहीं किया है। फिर तुम किसे ढूँढ़ रही हो और तुम्हारे मनोरथका क्या स्वरूप है?’॥ १५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.62.15 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 527) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/62/15/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)