श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.68.9

दशम स्कन्ध · अध्याय 68 · अथाष्टषष्टितमोऽध्यायः

विस्फूर्ज्य रुचिरं चापं सर्वान् विव्याध सायकैः।

कर्णादीन् षड्रथान् वीरांस्तावद्भिर्युगपत् पृथक्॥ ९

visphūrjya ruciraṃ cāpaṃ sarvān vivyādha sāyakaiḥ|

karṇādīn ṣaḍrathān vīrāṃstāvadbhiryugapat pṛthak|| 9

अर्थ

साम्बने अपने सुन्दर धनुषका टंकार करके कर्ण आदि छः वीरोंपर, जो अलग-अलग छः रथोंपर सवार थे, छः-छः बाणोंसे एक साथ अलग-अलग प्रहार किया॥ ९॥✎ 1858

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1858 अक्षर (एक स्थानपर, प्रमाणसहित): ्सिंहके → सिंहके

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