एक दिनकी बात है, सती यशोदाजी अपने प्यारे लल्लाको गोदमें लेकर दुलार रही थीं। सहसा श्रीकृष्ण चट्टानके समान भारी बन गये। वे उनका भार न सह सकीं॥ १८॥✎ 2061
एकदाऽऽरोहमारूढं लालयन्ती सुतं सती।
गरिमाणं शिशोर्वोढुं न सेहे गिरिकूटवत्॥ १८
एक दिनकी बात है, सती यशोदाजी अपने प्यारे लल्लाको गोदमें लेकर दुलार रही थीं। सहसा श्रीकृष्ण चट्टानके समान भारी बन गये। वे उनका भार न सह सकीं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.7.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 164) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/7/18/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)