सारा व्रज दो घड़ीतक रज और तमसे ढका रहा। यशोदाजीने अपने पुत्रको जहाँ बैठा दिया था, वहाँ जाकर देखा तो श्रीकृष्ण वहाँ नहीं थे॥ २२॥
मुहूर्तमभवद् गोष्ठं रजसा तमसाऽऽवृतम्।
सुतं यशोदा नापश्यत्तस्मिन् न्यस्तवती यतः॥ २२
सारा व्रज दो घड़ीतक रज और तमसे ढका रहा। यशोदाजीने अपने पुत्रको जहाँ बैठा दिया था, वहाँ जाकर देखा तो श्रीकृष्ण वहाँ नहीं थे॥ २२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.7.22 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 164) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/7/22/