श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.7.27

दशम स्कन्ध · अध्याय 7 · अथ सप्तमोऽध्यायः

तमश्मानं मन्यमान आत्मनो गुरुमत्तया।

गले गृहीत उत्स्रष्टुं नाशक्‍नोदद्भुतार्भकम्॥ २७

tamaśmānaṃ manyamāna ātmano gurumattayā|

gale gṛhīta utsraṣṭuṃ nāśaknodadbhutārbhakam|| 27

अर्थ

तृणावर्त अपनेसे भी भारी होनेके कारण श्रीकृष्णको नीलगिरिकी चट्टान समझने लगा। उन्होंने उसका गला ऐसा पकड़ा कि वह उस अद्भुत शिशुको अपनेसे अलग नहीं कर सका॥ २७॥

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