तृणावर्त अपनेसे भी भारी होनेके कारण श्रीकृष्णको नीलगिरिकी चट्टान समझने लगा। उन्होंने उसका गला ऐसा पकड़ा कि वह उस अद्भुत शिशुको अपनेसे अलग नहीं कर सका॥ २७॥
तमश्मानं मन्यमान आत्मनो गुरुमत्तया।
गले गृहीत उत्स्रष्टुं नाशक्नोदद्भुतार्भकम्॥ २७
तृणावर्त अपनेसे भी भारी होनेके कारण श्रीकृष्णको नीलगिरिकी चट्टान समझने लगा। उन्होंने उसका गला ऐसा पकड़ा कि वह उस अद्भुत शिशुको अपनेसे अलग नहीं कर सका॥ २७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.7.27 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 165) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/7/27/