जब कुन्तीने अपने त्रिभुवनपति भतीजे श्रीकृष्णको देखा, तब उनका हृदय प्रेमसे भर आया। वे पलंगसे उठकर अपनी पुत्रवधू द्रौपदीके साथ आगे गयीं और भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगा लिया॥ ३९॥ देवदेवेश्वर भगवान् श्रीकृष्णको राजमहलके अंदर लाकर राजा युधिष्ठिर आदरभाव और आनन्दके उद्रेकसे आत्म-विस्मृत हो गये; उन्हें इस बातकी भी सुधि न रही कि किस क्रमसे भगवान्की पूजा करनी चाहिये॥ ४०॥ भगवान् श्रीकृष्णने अपनी फूआ कुन्ती और गुरुजनोंकी पत्नियोंका अभिवादन किया। उनकी बहिन सुभद्रा और द्रौपदीने भगवान्को नमस्कार किया॥ ४१॥
यह व्याख्या श्लोक 10.71.39 से 10.71.41 तककी एक साथ है।
पृथा विलोक्य भ्रात्रेयं कृष्णं त्रिभुवनेश्वरम्।
प्रीतात्मोत्थाय पर्यंकात् सस्नुषा परिषस्वजे॥ ३९
जब कुन्तीने अपने त्रिभुवनपति भतीजे श्रीकृष्णको देखा, तब उनका हृदय प्रेमसे भर आया। वे पलंगसे उठकर अपनी पुत्रवधू द्रौपदीके साथ आगे गयीं और भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगा लिया॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.71.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 579) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/10/71/39/