श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.71.40

दशम स्कन्ध · अध्याय 71 · अथैकसप्ततितमोऽध्यायः

गोविन्दं गृहमानीय देवदेवेशमादृतः।

पूजायां नाविदत् कृत्यं प्रमोदोपहतो नृपः॥ ४०

govindaṃ gṛhamānīya devadeveśamādṛtaḥ|

pūjāyāṃ nāvidat kṛtyaṃ pramodopahato nṛpaḥ|| 40

अर्थ

देवदेवेश्‍वर भगवान् श्रीकृष्णको राजमहलके अंदर लाकर राजा युधिष्ठिर आदरभाव और आनन्दके उद्रेकसे आत्म-विस्मृत हो गये; उन्हें इस बातकी भी सुधि न रही कि किस क्रमसे भगवान्‌की पूजा करनी चाहिये॥ ४०॥

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