अर्जुन गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषा करते थे और स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण आये हुए अतिथियोंके पाँव पखारनेका काम करते थे। देवी द्रौपदी भोजन परसनेका काम करतीं और उदारशिरोमणि कर्ण खुले हाथों दान दिया करते थे॥ ५॥✎ 1713
गुरुशुश्रूषणे जिष्णुः कृष्णः पादावनेजने।
परिवेषणे द्रुपदजा कर्णो दाने महामनाः॥ ५
अर्जुन गुरुजनोंकी सेवा-शुश्रूषा करते थे और स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण आये हुए अतिथियोंके पाँव पखारनेका काम करते थे। देवी द्रौपदी भोजन परसनेका काम करतीं और उदारशिरोमणि कर्ण खुले हाथों दान दिया करते थे॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.75.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 597) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/75/5/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)