श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

तावङ्‌घ्रियुग्ममनुकृष्य सरीसृपन्तौ

घोषप्रघोषरुचिरं व्रजकर्दमेषु।

तन्‍नादहृष्टमनसावनुसृत्य लोकं

मुग्धप्रभीतवदुपेयतुरन्ति मात्रोः॥ २२

tāvaṅghriyugmamanukṛṣya sarīsṛpantau

ghoṣapraghoṣaruciraṃ vrajakardameṣu|

tannādahṛṣṭamanasāvanusṛtya lokaṃ

mugdhaprabhītavadupeyaturanti mātroḥ|| 22

अर्थ

दोनों भाई अपने नन्हे-नन्हे पाँवोंको गोकुलकी कीचड़में घसीटते हुए चलते। उस समय उनके पाँव और कमरके घुँघरू रुनझुन बजने लगते। वह शब्द बड़ा भला मालूम पड़ता। वे दोनों स्वयं वह ध्वनि सुनकर खिल उठते। कभी-कभी वे रास्ते चलते किसी अज्ञात व्यक्तिके पीछे हो लेते। फिर जब देखते कि यह तो कोई दूसरा है, तब झक-से रह जाते और डरकर अपनी माताओं—रोहिणीजी और यशोदाजीके पास लौट आते॥ २२॥

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