श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

सा गृहीत्वा करे कृष्णमुपालभ्य हितैषिणी।

यशोदा भयसम्भ्रान्तप्रेक्षणाक्षमभाषत॥ ३३

sā gṛhītvā kare kṛṣṇamupālabhya hitaiṣiṇī|

yaśodā bhayasambhrāntaprekṣaṇākṣamabhāṣata|| 33

अर्थ

हितैषिणी यशोदाने श्रीकृष्णका हाथ पकड़ लिया†। उस समय श्रीकृष्णकी आँखें डरके मारे नाच रही थीं‡। यशोदा मैयाने डाँटकर कहा—॥ ३३॥✎ 1404 1405 1406 1407 2238 2239

टिप्पणियाँ

  1. †

    यशोदाजी जानती थीं कि इस हाथने मिट्टी खानेमें सहायता की है। चोरका सहायक भी चोर ही है। इसलिये उन्होंने हाथ ही पकड़ा।

    (मुद्रित पृष्ठ 178)
  2. ‡

    भगवान्‌के नेत्रमें सूर्य और चन्द्रमाका निवास है। वे कर्मके साक्षी हैं। उन्होंने सोचा कि पता नहीं श्रीकृष्ण मिट्टी खाना स्वीकार करेंगे कि मुकर जायँगे। अब हमारा कर्तव्य क्या है। इसी भावको सूचित करते हुए दोनों नेत्र चकराने लगे।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 178)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (6)
  • #1404 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): थींण्। → थीं।
  • #1405 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): लियाञ्। → लिया।
  • #1406 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कहा—‘माँ! → कहा—‘मा!
  • #1407 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): माँ → मा
  • #2238 टिप्पणी: → यशोदाजी जानती थीं कि इस हाथने मिट्टी खानेमें सहायता की है। चोरका सहायक भी चोर ही है। इसलिये उन्होंने हाथ ही पकड़ा।
  • #2239 टिप्पणी: → भगवान्‌के नेत्रमें सूर्य और चन्द्रमाका निवास है। वे कर्मके साक्षी हैं। उन्होंने सोचा कि पता नहीं श्रीकृष्ण मिट्टी खाना स्वीकार करेंगे कि मुकर जायँगे। अब हमारा कर्तव्य क्या है। इसी भावको सूचित करते हुए दोनों नेत्र चकराने लगे। 

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