श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.8.38

दशम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

ज्योतिश्‍चक्रं जलं तेजो नभस्वान् वियदेव च।

वैकारिकाणीन्द्रियाणि मनो मात्रा गुणास्त्रयः॥ ३८

jyotiścakraṃ jalaṃ tejo nabhasvān viyadeva ca|

vaikārikāṇīndriyāṇi mano mātrā guṇāstrayaḥ|| 38

अर्थ

यशोदाजीने देखा कि उनके मुँहमें चर-अचर सम्पूर्ण जगत् विद्यमान है। आकाश (वह शून्य जिसमें किसीकी गति नहीं), दिशाएँ, पहाड़, द्वीप और समुद्रोंके सहित सारी पृथ्वी, बहनेवाली वायु, वैद्युत, अग्‍नि, चन्द्रमा और तारोंके साथ सम्पूर्ण ज्योतिर्मण्डल, जल, तेज, पवन, वियत् (प्राणियोंके चलने-फिरनेका आकाश), वैकारिक अहंकारके कार्य देवता, मन-इन्द्रिय, पंचतन्मात्राएँ और तीनों गुण श्रीकृष्णके मुखमें दीख पड़े॥ ३७-३८॥

यह अर्थ श्लोक 37–38 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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