॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.8.39
एतद् विचित्रं सह जीवकाल-
स्वभावकर्माशयलिंगभेदम् ।
सूनोस्तनौ वीक्ष्य विदारितास्य
व्रजं सहात्मानमवाप शंकाम्॥ ३९
etad vicitraṃ saha jīvakāla-
svabhāvakarmāśayaliṃgabhedam |
sūnostanau vīkṣya vidāritāsya
vrajaṃ sahātmānamavāpa śaṃkām|| 39
अर्थ
परीक्षित्! जीव, काल, स्वभाव, कर्म, उनकी वासना और शरीर आदिके द्वारा विभिन्न रूपोंमें दीखनेवाला यह सारा विचित्र संसार, सम्पूर्ण व्रज और अपने-आपको भी यशोदाजीने श्रीकृष्णके नन्हेसे खुले हुए मुखमें देखा। वे बड़ी शंकामें पड़ गयीं॥ ३९॥